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Sudha Upadhyay


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मुझे गर्व है की नारी हूँ मैं !

Posted On: 30 Jun, 2012  
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युवा मुख्यमंत्री का साहसिक निर्णय

Posted On: 30 Jun, 2012  
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samay

Posted On: 26 May, 2012  
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Pain of beggers

Posted On: 24 May, 2012  
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Hello world!

Posted On: 19 Apr, 2012  
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

सत्य है की सभी नारियां एक सी नहीं हैं .सभी पुरुष भी तो एक जैसे नहीं होते. हम मध्यमवर्गीय परिवारों से सम्बन्ध रखते हैं . ऐसी नारियां निश्चित रूप से हमारी सराहना का पात्र नहीं....हमारी संस्कृति या शायद पारिवारिक मूल्य ही हमें प्रेरित करते हैं कि हम इनकी आलोचना करें... परन्तु सच तो ये है रातोंरात शोहरत कमाने का आज ये जरिया बन गया है. यदि आप सब - सभी पुरुष, सभी महिलाएं इन्हें नापसंद करते हैं तो ये रातोंरात शोहरत कैसे पा जाती हैं? क्यों यही आज का ट्रेंड बन गया है? वास्तविकता यह है कि यह हमारे समाज की दोहरी मानसिकता के कारण है. पुरुषों को अपने परिवार के सदस्य तो सुसंस्कृत चाहिए लेकिन वह कटरीना और करीना का दीवाना है. मैं क्या करूँ?

के द्वारा: Sudha Upadhyay Sudha Upadhyay

प्रतिक्रिया देने के लिए धन्यवाद. मुझे बिलकुल विचित्र नहीं लग रहा है .आखिर भारतीय स्त्री हूँ! आदत पड़ गयी है पुरुष प्रधान समाज में रहने की, उसे सुनने की . ईश्वरीय वरदान पर गर्व है. आपने आसानी से कह दिया कि यह घमंड है किन्तु यदि स्त्री होते तो आप समझ सकते कि यह सब इतना आसान नहीं. माँ का जीवन एक नया जीवन होता है. पुरुष पर निर्भरता को मैंने स्वीकार कर लिया निस्संकोच पर शायद आप के लिए नारी का गर्वित होना असंभव है. मुझे शायद लिखना चाहिए कि नारी पुरुष के बिना अस्तित्वविहीन है. मैंने देखा है अपने से आगे निकलता देखकर लड़के लड़कियों कि टांग खींचना शुरू करते हैं . अब परिपक्व हो चुकी हूँ...हास्यास्पद है यह सब मेरे लिए . फिर भी प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद. जल्दी ही आपको अगली कविता पढने के लिए मिलेगी पुरुष अहम् के साथ तैयार रहे....

के द्वारा: Sudha Upadhyay Sudha Upadhyay

अच्छी कविता , आप काफी अच्छा लिखती हैं आपसे सहमत हूँ ,नारी की जहा पूजा होती हैं वह देवता बसते हैं.... किन्तु ऐसे लगता हैं जैसे गर्व ,घमंड में बदल रहां हों , जीवविज्ञान की दृष्टि से नारी का शरीर पुरुष से भिन्न हैं ,नारी सम्मान की पात्र हैं ,थी और रहेंगी....सही उन्नत समाज सकरात्मक नारियों से हैं ...परिवार उनके नजरिये से चलते हैं . आपने उस नारी के बारे में नही लिखा जो आज टी वी पर बदन उघारने को बेकरार हैं .....सीना तान कर सामाजिक स्थलों पर दारु सिगरेट पीती हैं ...उदाहरण इलाहाबाद के नये यमुना पुल पर आकर देख सकती हैं ... महानगरी मुंबई में लेखकों,निर्माताओ ,नायको के आगे रोल पाने को किस तरह फ्लर्ट करती हैं .... उसके बारे में भी लिखिये .... ,पुरुषों जैसा कठोर क्यों बनना चाहती हैं आज की नारी ... http://avchetnmn.jagranjunction.com/2012/07/02/आधुनिक-शिक्षा-का-यह-रूप-भी/

के द्वारा: prep4mbbs prep4mbbs

अच्छी कविता , आप काफी अच्छा लिखती हैं आपसे सहमत हूँ ,नारी की जहा पूजा होती हैं वह देवता बसते हैं.... किन्तु ऐसे लगता हैं जैसे गर्व ,घमंड में बदल रहां हों , जीवविज्ञान की दृष्टि से नारी का शरीर पुरुष से भिन्न हैं ,नारी सम्मान की पात्र हैं ,थी और रहेंगी....सही उन्नत समाज सकरात्मक नारियों से हैं ...परिवार उनके नजरिये से चलते हैं . आपने उस नारी के बारे में नही लिखा जो आज टी वी पर बदन उघारने को बेकरार हैं .....सीना तान कर सामाजिक स्थलों पर दारु सिगरेट पीती हैं ...उदाहरण इलाहाबाद के नये यमुना पुल पर आकर देख सकती हैं ... महानगरी मुंबई में लेखकों,निर्माताओ ,नायको के आगे रोल पाने को किस तरह फ्लर्ट करती हैं .... उसके बारे में भी लिखिये .... ,पुरुषों जैसा कठोर क्यों बनना चाहती हैं आज की नारी ...

के द्वारा: prep4mbbs prep4mbbs

सुधा जी सादर नमस्कार, आप अपनी रचना में नारी होने पर गर्वित होने कि बात कर रही हैं किन्तु भाषा और शब्द तो सारे घमंड के हैं. यदि आप सिर्फ यह कह रही हैं कि नारी होना गर्व कि बात है तो क्या पुरुष होना शर्म कि बात है? अवश्य ही नारी ने संसार कि रचना को आगे बढाया है किन्तु क्या पुरुष निष्क्रिय था?"यद्यपि पुरुष पर निर्भर कुछ सीमा तक" पुरुष पर निर्भरता बताने में संकोच क्यों? क्षमा करें आपके ब्लॉग पर प्रथम प्रतिक्रया ही कठोर देना पड़ रही है,मै नारी का शत्रु नहीं, मै नारी के पुरे सम्मान का तरफदार हूँ किन्तु इस मै के टकराव ने ही शायद पुरुष को माँ बनने कि वैज्ञानिक क्रांति करने को मजबूर किया है.

के द्वारा: akraktale akraktale




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